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एक बहुत बड़ा काम
समुद्र के किनारे राम और उनके साथियों के सामने बड़ा काम था। सीता समुद्र पार लंका में थीं और वहाँ पहुँचने का रास्ता चाहिए था। राम के वानर साथी पुल बना रहे थे। बलवान साथी पत्थर लाते और दूसरे उन्हें रखने में सहायता करते। यह काम इतना बड़ा था कि कोई अकेला इसे पूरा नहीं कर सकता था।
पास में एक नन्ही गिलहरी काम देख रही थी। उसके छोटे पंजों के सामने हर पत्थर बहुत बड़ा लगता था। वानर जो उठा रहे थे, वह नहीं उठा सकती थी। समुद्र तो और भी विशाल था। फिर भी वह राम की सहायता करना चाहती थी। उसने किनारे पर नज़र दौड़ाई और कुछ ऐसा पाया जिसे वह ला सकती थी—थोड़ी-सी रेत।
कथा के इस रूप में गिलहरी ने पानी के किनारे अपना शरीर भिगोया और रेत पर लोट गई। रेत के कण उसके गीले बालों से चिपक गए। वह पुल की ओर गई और शरीर झटककर रेत गिरा दी। फिर और रेत लेने लौट चली। उसका बोझ गिरने पर कोई बड़ी आवाज़ नहीं हुई, बस पत्थरों के पास थोड़ी-सी रेत बिखरी।
बार-बार, थोड़ी-सी रेत
पानी के पास जाना, रेत पर लोटना और काम की जगह तक पहुँचना—गिलहरी बार-बार यही करती रही। वानर एक बार में जितना ला सकते थे, वह कई चक्करों में भी नहीं ला पाती थी। लेकिन वह अपनी शक्ति भर काम कर रही थी। सहायता करने की इच्छा के लिए उसे कोई दूसरा जीव बनने की ज़रूरत नहीं थी।
कुछ साथियों ने उसे देखा और हँसने लगे। इतना-सा बोझ! बड़ी चट्टान के सामने इससे क्या होगा? उनकी हँसी से गिलहरी को दुख हुआ। अभी तक उसे अपना काम करने योग्य लगता था, पर अब उसकी तुलना केवल सबसे बड़े बोझ से हो रही थी। वह रुक गई। क्या इन शक्तिशाली साथियों के बीच उसके लिए कोई जगह थी?
राम की नज़र नन्ही सहायक पर पड़ी और उन्होंने उसकी बात सुनी। गिलहरी सेवा करना चाहती थी, पर उसका छोटा शरीर जितना ला सकता था, उतना ही लाती थी। राम ने उससे अपनी क्षमता से बड़ी चट्टान उठाने को नहीं कहा। उन्होंने उसके बार-बार आने-जाने के पीछे का भाव देखा और साथियों से भी उस प्रयास का सम्मान करने को कहा।
नन्ही सहायक के लिए जगह
मिलकर किए जा रहे काम में शक्ति के साथ संवेदना भी चाहिए थी। बड़े साथी छोटे सहायक पर हँसने के बजाय उसके लिए जगह बना सकते थे। गिलहरी का योगदान छोटा था, लेकिन उसके पीछे का प्रेम छोटा नहीं था। राम के ध्यान देने से झिझक और उदासी का वह पल अपनापन मिलने के पल में बदल गया।
राम ने धीरे से गिलहरी की पीठ सहलाई। लोककथा कहती है कि उनकी उँगलियों के स्पर्श से उसके शरीर पर तीन धारियाँ बन गईं। वे धारियाँ उनके आशीर्वाद की याद बन गईं। अपना प्रयास पहचाने जाने पर गिलहरी फिर से साथियों के बीच अपना काम कर सकती थी।
पुल बनाना अब भी बड़ा काम था और बड़ी चट्टानें अब भी लानी थीं। गिलहरी अचानक सबसे शक्तिशाली साथी नहीं बन गई थी। बदला यह था कि उसके साथी उसे कैसे देखते थे। एक ही काम में कई तरह की मदद हो सकती थी, और सम्मान पाने के लिए सबसे बड़ा होना आवश्यक नहीं था।
