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एक फल, दो भाई
पर्वत पर अपने घर में गणेश और उनके भाई कार्तिकेय के सामने एक पहेली आई। एक विशेष फल था और दोनों भाई उसे पाना चाहते थे। इस कथा में शिव और पार्वती ने एक शर्त रखी: जो पहले संसार की परिक्रमा करके लौटेगा, उसे फल मिलेगा। दोनों ने ध्यान से सुना। पूरे संसार की परिक्रमा! यह तो बहुत लंबी यात्रा होगी।
कार्तिकेय तैयार थे। उनका मोर उन्हें पहाड़ों, जंगलों, नदियों और दूर-दूर के तटों के ऊपर ले जा सकता था। वे उसकी पीठ पर बैठे और मोर ने पंख फैला दिए। कुछ ही देर में दोनों आकाश में एक छोटे-से बिंदु जैसे दिखाई देने लगे। कार्तिकेय ने इस काम को धरती की यात्रा माना था और वे पूरी लगन से उसे करने निकल पड़े थे।
गणेश ने अपने साथी, नन्हे मूषक की ओर देखा। उसके छोटे पैर ज़मीन पर तेज़ दौड़ते थे, लेकिन मोर के पंखों की तरह आकाश में नहीं उड़ सकते थे। गणेश भी तुरंत चल सकते थे, पर केवल जल्दी करने से कठिनाई दूर नहीं होती। इसलिए उन्होंने कुछ पल ठहरकर प्रश्न के बारे में सोचा।
एक अलग यात्रा
‘संसार’ का क्या अर्थ है? एक संसार तो यह विशाल धरती थी—पर्वत, जल, जीव-जंतु और लोग। फिर गणेश ने सामने बैठे माता-पिता को देखा। शिव और पार्वती से उन्हें घर, स्नेह और सीखने का अवसर मिला था। उन्हीं के साथ रहकर उन्होंने संसार को जानना शुरू किया था।
गणेश अपने माता-पिता के पास गए और प्रणाम किया। फिर उनकी परिक्रमा करने लगे। एक बार, दो बार, तीन बार—वे आदर से शिव और पार्वती के चारों ओर चले। इस यात्रा में मूषक को मोर से तेज़ दौड़ने की ज़रूरत नहीं थी। यहाँ गति से अधिक महत्त्व उस भाव का था जिसे गणेश अपनी परिक्रमा से व्यक्त कर रहे थे।
परिक्रमा पूरी करके गणेश ने अपना उत्तर समझाया। उनके लिए माता-पिता पूरे संसार का रूप थे, इसलिए उन्होंने प्रेम से उनकी परिक्रमा की थी। शिव और पार्वती ने इस छोटे-से चक्कर के पीछे छिपी समझदारी पहचानी। कथा के इस रूप में उन्होंने गणेश का उत्तर स्वीकार किया और फल उन्हें दे दिया।
दुनिया किससे बनती है?
लंबी उड़ान के बाद कार्तिकेय लौटे तो गणेश पहले से वहाँ थे। एक भाई दूर-दूर तक गया था और दूसरा घर के पास ही रहा था। गणेश का उत्तर सुनकर कार्तिकेय समझ गए कि माता-पिता ने उसे क्यों स्वीकार किया। एक ही प्रश्न ने दोनों भाइयों को दो बिल्कुल अलग यात्राएँ सुझाई थीं।
हम कार्तिकेय की लगन और गणेश की सूझबूझ, दोनों की सराहना कर सकते हैं। गणेश के उत्तर से धरती छोटी नहीं हो गई थी, न मूषक मोर से तेज़ बन गया था। उन्होंने एक जाने-पहचाने शब्द का गहरा अर्थ खोजा था। कभी-कभी यह सोचने से पहले कि काम कितनी जल्दी करें, यह समझना अच्छा होता है कि हमें करना क्या है।
