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पुराने मित्र के लिए पोटली
द्वारका में रहने से बहुत पहले कृष्ण और सुदामा अपने गुरु के आश्रम में साथ पढ़ते थे। उन्होंने साथ सीखा, काम किया और अनेक दिन बिताए। उन्हीं दिनों में उनकी मित्रता पनपी थी। अब दोनों का जीवन बहुत अलग था। कृष्ण महलों में रहते थे। सुदामा और उनकी पत्नी के लिए घर में पर्याप्त भोजन जुटाना भी कठिन था।
सुदामा की पत्नी ने उन्हें अपने पुराने मित्र से मिलने के लिए कहा। कृष्ण अपने पास आने वालों का ध्यान रखते थे; शायद वे उनकी भी सहायता करें। सुदामा कृष्ण से मिलना चाहते थे, लेकिन खाली हाथ जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था। उनकी पत्नी ने थोड़े-से चिवड़े जुटाए और कपड़े में बाँध दिए। उनके पास बहुत कम था, फिर भी उन्होंने प्रेम से यह छोटी भेंट तैयार की।
पोटली लेकर सुदामा चल पड़े। इतने वर्षों बाद मिलना कैसा होगा? कृष्ण के निवास पर पहुँचकर उन्हें अपने पुराने कपड़े और छोटी भेंट वहाँ की भव्यता के सामने बहुत साधारण लगे। लंबी यात्रा के बाद वे ऐसा उपहार लेकर आए थे जो एक हथेली में समा सकता था। तभी कृष्ण की नज़र उन पर पड़ी।
प्रेम भरा स्वागत
कृष्ण उठे और सुदामा को गले लगा लिया। उन्होंने मित्र को आसन दिया और आदरणीय अतिथि की तरह उनके पैर धोए। रुक्मिणी ने भी सुदामा की सेवा की। आसपास के लोग देख रहे थे कि कृष्ण इस अतिथि का कितना ध्यान रख रहे हैं। वे अच्छे कपड़ों या बड़े उपहार की प्रतीक्षा नहीं कर रहे थे। उनका मित्र अपने आप में ही प्रिय था।
दोनों साथ बैठे और विद्यार्थी जीवन की बातें करने लगे—गुरु की, काम की और साथ बिताए समय की। सुदामा को उस महल में फिर से अपना पुराना अपनापन मिला। कृष्ण ने पूछा कि मित्र उनके लिए क्या लाए हैं। सुदामा झिझक गए। जिसके पास सब कुछ हो, उसके लिए थोड़े-से चिवड़े कैसे पर्याप्त होंगे?
कृष्ण ने आनंद से पोटली स्वीकार की और उसमें से चिवड़े खाए। उनके लिए भेंट के पीछे का प्रेम महत्त्वपूर्ण था। उस रात सुदामा वहीं रहे। उन्हें भोजन, विश्राम और भरपूर स्नेह मिला। घर से वे बड़ी ज़रूरत लेकर निकले थे, फिर भी कृष्ण से धन माँगने के शब्द नहीं जुटा पाए। मित्र से मिलने का सुख उनके मन में छाया रहा।
घर लौटने की यात्रा
लौटते समय सुदामा को बार-बार कृष्ण का गले लगाना, साथ की बातें और मिला हुआ सम्मान याद आया। घर की कठिनाई दूर करने के लिए उन्होंने कुछ माँगा ही नहीं था। फिर भी एक बात वे अनुभव कर चुके थे: जीवन की परिस्थितियाँ अलग होने से उनकी पुरानी मित्रता समाप्त नहीं हुई थी।
घर पहुँचकर सुदामा उस जगह को पहचान ही नहीं पाए। इस भक्तिपूर्ण कथा में उनका साधारण घर सुंदर और समृद्ध निवास बन चुका था। उनकी पत्नी उनसे मिलने बाहर आईं। सुदामा ने इस परिवर्तन को कृष्ण की कृपा माना। उनकी कठिनाई दूर हो गई थी, जबकि भेंट के समय कृष्ण ने ऐसे किसी उपहार का उल्लेख नहीं किया था।
सुदामा कृष्ण के प्रति भक्तिभाव बनाए रहे। कथा का चमत्कार कोई सौदा नहीं है जिसमें मुट्ठी-भर चिवड़े देकर महल खरीदा जाए। इसके केंद्र में ऐसी मित्रता है जिसमें व्यक्ति का पूरे मन से स्वागत होता है और प्रेम से दी गई भेंट प्रेम से स्वीकार की जाती है। ऐसा अपनापन देने के लिए किसी भव्य वस्तु का होना ज़रूरी नहीं।
