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पंपा के पास दो यात्री
सीता को खोजते हुए राम और लक्ष्मण पंपा के आसपास के प्रदेश में पहुँचे थे। स्थान सुंदर था, पर वे घूमने नहीं आए थे। उन्हें सहायता की तलाश थी। उनके पास धनुष थे और उनका रूप राजकुमारों जैसा था, लेकिन वस्त्र और जटाएँ वन में बिताए जीवन का परिचय देते थे।
पास ही सुग्रीव रहते थे। भाई वाली से अलग होकर वे उनसे भयभीत थे। दो सशस्त्र अनजान यात्रियों को आते देखकर सुग्रीव चिंतित हुए। दूर से समझ नहीं आ रहा था कि वे मित्र हैं या कोई खतरा। उन्होंने अपने भरोसेमंद मंत्री हनुमान से उनका परिचय जानने के लिए कहा।
हनुमान एक तपस्वी का रूप लेकर गए। उन्होंने धमकी या कठोर माँग से बात शुरू नहीं की। यात्रियों का आदर से अभिवादन किया और जो देखा था, उसकी बात की—उनका बल, वन के वस्त्र और यात्रा में दिखाई देती उदासी। वे सामने खड़े लोगों को समझना चाहते थे, पर उनकी पूरी कहानी अभी नहीं जानते थे।
सोच-समझकर दिया परिचय
हनुमान बोलते रहे और दोनों भाई सुनते रहे। उन्होंने तुरंत उत्तर नहीं दिया। उनकी चुप्पी को झगड़ा मानने के बजाय हनुमान ने अपने आने का कारण अधिक स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि वे हनुमान हैं, एक वानर और सुग्रीव के मंत्री। उनके स्वामी मित्रता चाहते हैं।
अब भाइयों के सामने भेंट का उद्देश्य साफ़ था। आगंतुक ने अपना नाम बताया था, उस व्यक्ति से अपना संबंध बताया था जिसे वे खोज रहे थे और उसका संदेश दिया था। आदर से बोलना महत्त्वपूर्ण था, साथ ही सही जानकारी देना भी। मधुर शब्द तब और उपयोगी होते हैं जब उनसे बात समझ में आए।
राम हनुमान की वाणी से प्रसन्न हुए। उन्होंने लक्ष्मण से उसमें झलकती सावधानी और विद्या की चर्चा की। हनुमान स्पष्ट बोलते थे, न जल्दबाज़ी में और न कठोरता से। राम ने ऐसे व्यक्ति को पहचाना जो महत्त्वपूर्ण संदेश अच्छी तरह पहुँचा सकता था। उन्होंने लक्ष्मण से सुग्रीव के मंत्री को उत्तर देने के लिए कहा।
मित्रता की ओर पहला कदम
लक्ष्मण ने कहा कि उन्होंने सुग्रीव के बारे में सुना है और वे उन्हें ही खोज रहे हैं। हनुमान जो अवसर लाए थे, वे उसका स्वागत करते थे। सोचिए, उस पल क्या बदला! अनिश्चितता से शुरू हुई भेंट में अब आगे बढ़ने का मार्ग दिख रहा था। यात्री और दूत समझ सकते थे कि उनके उद्देश्य जुड़ सकते हैं।
हनुमान प्रसन्न हुए। उनका काम बहस जीतना या अनजान यात्रियों के बारे में सब जानने का दिखावा करना नहीं था। उन्हें ऐसी बातचीत शुरू करनी थी जो सहयोग तक पहुँच सके। परिचय सफल हुआ था। अगला कदम राम और सुग्रीव को मिलाना और उनकी मित्रता का मार्ग खोलना था।
आगे चलकर हनुमान राम की सेवा में समुद्र पार करेंगे और पर्वत उठाएँगे। यहाँ उनकी सहायता शब्दों से शुरू हुई। उन्होंने ध्यान दिया, अपना परिचय बताया और संदेश स्पष्ट किया। यह बड़ी छलाँग से शांत शुरुआत है, लेकिन इसका महत्त्व है। एक-दूसरे की सहायता करने से पहले अक्सर एक-दूसरे को समझने का अवसर चाहिए होता है।
