Sundarkand Story Episode 3 | मैनाक पर्वत ने हनुमान को विश्राम के लिए बोला
वीडियो निर्माता: KanhaiyaCassette
वीडियो की भाषा: हिन्दीअवधि: 4:20
देखने से पहले
चौपाइयों के साथ रामचरितमानस का अभिनय-प्रसंग: मैनाक का विश्राम का निमंत्रण और हनुमान की आभारपूर्ण विदाई। पर्वतों के पंख काटने का उल्लेख और आगे आने वाली सुरसा की परीक्षा का छोटा परिचय है। विश्राम न करने का यह भक्तिपरक प्रसंग थकान की उपेक्षा करने की सीख नहीं है। कैप्शन में पहचान की गलतियाँ हैं। YouTube पर दूसरी भाषाओं के डब भी हैं; ज़रूरत हो तो प्लेयर के ऑडियो ट्रैक में मूल हिन्दी चुनें।
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समुद्र से कुछ उठा
हनुमान लंका में सीता की खोज के लिए समुद्र पार कर रहे थे। नीचे दूर तक जल था और आगे वह काम था जिसे करने का उन्होंने वचन दिया था। समुद्र राम के काम में लगे यात्री की सहायता करना चाहता था। उसने अपने जल के नीचे छिपे मैनाक पर्वत से ऊपर उठकर विश्राम का स्थान देने को कहा।
मैनाक समुद्र से उठे। सुनहरे शिखर हनुमान के मार्ग में दिखाई दिए; उनके पेड़ और लताएँ जल से बहुत ऊपर आ गए। आकाश से अचानक उठा पर्वत रास्ता रोकता हुआ लगा। हनुमान को अभी उसके आने का कारण नहीं पता था। उन्होंने उसे बाधा मानकर अपने वक्ष से धक्का दिया।
लेकिन मैनाक खोज को रोकने नहीं आए थे। उन्होंने अपने शिखर पर मानव रूप लिया और हनुमान से स्नेह से बात की। यहाँ वे रुक सकते थे, फल खा सकते थे और आगे जाने से पहले विश्राम कर सकते थे। समुद्र ने मैनाक से सहायता करने को कहा था और पर्वत के पास स्वागत का अपना कारण भी था।
पुरानी सहायता की याद
मैनाक ने बताया कि बहुत पहले पर्वतों के पंख होते थे। वे आकाश में घूमते थे और जीवों को डर रहता था कि विशाल पर्वत उन पर न गिर पड़ें। इंद्र उनके पंख काटने लगे। मैनाक संकट में पड़े तो वायु देव उन्हें समुद्र में सुरक्षित ले आए। उनके पंख बच गए।
अब वायु के पुत्र ऊपर से जा रहे थे। मैनाक को पिता की सहायता याद थी और वे पुत्र का स्नेह से स्वागत करना चाहते थे। पुरानी रक्षा नई भेंट का निमंत्रण बन गई थी। हनुमान को केवल खड़े होने के लिए पत्थर नहीं मिल रहा था। उनका स्वागत ऐसा व्यक्ति कर रहा था जिसे मिली सहायता कृतज्ञता से याद थी।
हनुमान ने बात सुनी। उन्होंने मैनाक के स्नेह का आदर किया और स्वागत स्वीकार हुआ माना। फिर भी दिन बीत रहा था और उन्होंने काम पूरा करने का वचन दिया था। वे भोजन और विश्राम के लिए नहीं रुक सकते थे। उन्होंने यह बात ऐसे कही कि सद्भावना का अपमान न हो।
धन्यवाद के साथ आगे
फिर हनुमान ने हाथ से पर्वत को छुआ। यह आदर जताने का छोटा-सा संकेत था। मुस्कराते हुए वे फिर आकाश में उठ गए। न भोजन हुआ, न लंबी भेंट। फिर भी मैनाक की पेशकश महत्त्वपूर्ण थी और हनुमान ने अपना आभार स्पष्ट कर दिया था।
समुद्र और मैनाक ने शुभभावना के साथ उन्हें आगे जाते देखा। पर्वत पीछे रह गया और सीता की खोज हनुमान को आगे ले गई। यात्रा में दूसरी भेंटें भी होनी थीं, लेकिन इस भेंट में जहाँ पहले बाधा लगी थी, वहाँ मित्र मिला। किसी की पेशकश स्नेहभरी हो सकती है, भले ही उत्तर में मना करना पड़े।
आओ, इस पर बात करें
पहली धारणा के बाद हनुमान को पर्वत के बारे में क्या पता चला?
एक और प्रश्न
ऐसे निमंत्रण के लिए किन शब्दों में धन्यवाद देंगे जिसे स्वीकार नहीं कर सकते?
ऐसे निमंत्रण के लिए किन शब्दों में धन्यवाद देंगे जिसे स्वीकार नहीं कर सकते?
एक सीख, जो साथ रहे: आप स्पष्ट रूप से मना करते हुए भी किसी की सद्भावना का आदर कर सकते हैं।
स्नेहभरे उत्तर का अभ्यास · 5 मिनट
घर में किसी के साथ बारी-बारी से खेल या कहानी का काल्पनिक निमंत्रण दें।
मेज़बान हाँ के लिए ज़ोर दिए बिना निमंत्रण दे।
अतिथि धन्यवाद के साथ स्पष्ट उत्तर दे। चाहे तो दूसरा समय सुझाए।
भूमिकाएँ बदलें। बात करें कि किस बात से दोनों को आदर महसूस हुआ।
बड़ों के लिए एक बात
कथा में पंखों वाले पर्वत, छोटी टक्कर और इंद्र से हुए पुराने संकट की बात है। ये महाकाव्य की घटनाएँ हैं, बच्चों की यात्राओं का तरीका नहीं। हमारे शरीर को भोजन, विश्राम और विराम चाहिए। किसी प्रस्ताव को मना करने का अर्थ अपनी ज़रूरत अनदेखी करना या हर सहायता ठुकराना नहीं।
स्रोत और परंपरा
वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड 1 में मैनाक से भेंट का हमारा कथारूप। इसमें समुद्र का अनुरोध, हनुमान की पहली धारणा, वायु की सहायता की मैनाक की स्मृति और आभार के साथ विदा होना है। आगे सुरसा और सिंहिका से भेंट अलग प्रसंग हैं। महाकाव्य के योजन से निश्चित आधुनिक दूरी नहीं निकाली गई है।